बात सँभारे बोलिए, समुझि सुठाँव-कुठाँव ।
वातै हाथी पाइए, वातै हाथा-पाँव ॥१॥
निकले फिर पलटत नहीं, रहते अन्त पर्यन्त ।
सत्पुरुषों के वर-वचन, गजराजों के दन्त ।।२।।
सेवा किये कृतघ्न की, जात सबै मिलि धूल ।।
सुधा-धार हू सींचिये, सुफल न देत बबूल ।।३।।
काहू की मुसकानि पर, करियो जनि विश्वास ।
है समर्थ संसार मे, विज्जुलता को हास ।।४।।
चारि जने हिलि मिलि रहे, तबही होत सरङ्ग ।
खैर सुपारी चून ज्यों, मिलत पान के सङ्ग ।।५।।
- गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
[ कुसुमाञ्जलि ]