सदुपदेश | दोहे

रचनाकार: गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

बात सँभारे बोलिए, समुझि सुठाँव-कुठाँव ।
वातै हाथी पाइए, वातै हाथा-पाँव ॥१॥

निकले फिर पलटत नहीं, रहते अन्त पर्यन्त ।
सत्पुरुषों के वर-वचन, गजराजों के दन्त ।।२।।

सेवा किये कृतघ्न की, जात सबै मिलि धूल ।।
सुधा-धार हू सींचिये, सुफल न देत बबूल ।।३।।

काहू की मुसकानि पर, करियो जनि विश्वास ।
है समर्थ संसार मे, विज्जुलता को हास ।।४।।

चारि जने हिलि मिलि रहे, तबही होत सरङ्ग ।
खैर सुपारी चून ज्यों, मिलत पान के सङ्ग ।।५।।


- गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'
  [ कुसुमाञ्जलि ]